MERE MASIHA LYRICS IN HINDI & ENGLISH

“मैं घटती जाऊँ, तू बढ़ता जा” – एक आत्मीय भजन की गहराई

गीत हमेशा से हमारी आत्मा को छूने और हमारे भावों को व्यक्त करने का सबसे प्रभावी माध्यम रहा है। जब यह संगीत आध्यात्मिकता से जुड़ता है, तो यह न केवल हमारे दिलों को सुकून देता है, बल्कि हमें परमेश्वर के करीब भी ले जाता है। ऐसा ही एक खूबसूरत भजन है “मैं घटती जाऊँ, तू बढ़ता जा”, जो एक भक्त की परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम को दर्शाता है।

Mai ghatti jaaun tu badhta jaa
Mere masiha mere khuda..


Tu aasman se haath badha de..

Kadmo me apni mujhko jaga de..


Main khatkhataun tu khole jaa..
Mere masiha mere khuda..
Main tujhse mangu tu deta jaa
Meri rooh pyaasi tu pyaas bujha..


Sehed se meethi baatein hai teri..
Roshan karti raatein hai meri..


Main sunti jaaun tu bole jaa..
Mere masiha mere khuda..
Main tujhse mangu tu deta jaa
Meri rooh pyaasi tu pyaas bujha..

HINDI


मैं घटती जाऊँ, तू बढ़ता जा
मेरे मसीहा, मेरे खुदा..


तू आसमां से हाथ बढ़ा दे..
कदमों में अपनी मुझको जगा दे..


मैं खटखटाऊं, तू खोले जा..
मेरे मसीहा, मेरे खुदा..

मैं तुझसे मांगूं, तू देता जा
मेरी रूह प्यासि, तू प्यास बुझा..


शहद से मीठी बातें हैं तेरी..
रोशन करती रातें हैं मेरी..
मैं सुनती जाऊँ, तू बोले जा..
मेरे मसीहा, मेरे खुदा..

मैं तुझसे मांगूं, तू देता जा
मेरी रूह प्यासि, तू प्यास बुझा..

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MERE MASIHA भजन के भावार्थ और व्याख्या

1. प्रारंभिक पंक्तियाँ – परमेश्वर को बढ़ाने की प्रार्थना

“मैं घटती जाऊँ, तू बढ़ता जा
मेरे मसीहा, मेरे खुदा..”

यहाँ “मैं घटती जाऊँ” का अर्थ है कि मैं अपने अहंकार, अपनी इच्छाओं और सांसारिक चीजों को कम करूँ, ताकि परमेश्वर मेरे जीवन में अधिक प्रभावशाली बनें। जब हम अपने स्वयं के बारे में कम सोचते हैं और अपने जीवन को परमेश्वर को समर्पित करते हैं, तभी हम उनकी सच्ची महिमा को अनुभव कर सकते हैं।

2. पहला वर्स – परमेश्वर का हाथ हमें संभाले

“तू आसमां से हाथ बढ़ा दे..
कदमों में अपनी मुझको जगा दे..”

यह पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि हम ईश्वर से उनकी कृपा और सहायता मांग रहे हैं। हम अपने जीवन में कई बार गिरते हैं, संघर्षों से जूझते हैं, लेकिन अगर ईश्वर हमें थाम लें, तो हम फिर से खड़े हो सकते हैं। यहाँ पर एक भक्त की पूर्ण निर्भरता को दिखाया गया है, जो यह स्वीकार करता है कि बिना परमेश्वर की मदद के वह अपने जीवन के संघर्षों से नहीं उबर सकता।

3. कोरस – द्वार खोलने और आत्मा की तृष्णा बुझाने की प्रार्थना

“मैं खटखटाऊँ, तू खोले जा..
मैं तुझसे मांगूं, तू देता जा
मेरी रूह प्यासि, तू प्यास बुझा..”

इस पंक्ति में यीशु मसीह की शिक्षाओं का गहरा संदर्भ है। बाइबल में कहा गया है कि “मांगो तो तुम्हें दिया जाएगा, खोजो तो पाओगे, खटखटाओ तो तुम्हारे लिए द्वार खोला जाएगा” (मत्ती 7:7)। यह गीत हमें सिखाता है कि अगर हम ईश्वर से सच्चे मन से प्रार्थना करें, तो वह हमें अवश्य उत्तर देंगे।

4. दूसरा वर्स – ईश्वर के शब्दों की मिठास

“शहद से मीठी बातें हैं तेरी..
रोशन करती रातें हैं मेरी..”

इस पंक्ति में परमेश्वर के वचन और उनकी शिक्षाओं की मिठास को दर्शाया गया है। बाइबल में यीशु मसीह के शब्दों को जीवनदायी और मधुर बताया गया है।

“मैं सुनती जाऊँ, तू बोले जा..”

इस पंक्ति में एक भक्त की विनम्रता और उसकी सीखने की इच्छा झलकती है। वह चाहता है कि ईश्वर उसके जीवन में लगातार बोलते रहें, मार्गदर्शन करें और उसे सच्चाई के मार्ग पर चलाएं।


MERE MASIHA भजन का आध्यात्मिक महत्व

यह गीत केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से निकली एक पुकार है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में हमारा उद्देश्य सिर्फ सांसारिक उपलब्धियों को प्राप्त करना नहीं है, बल्कि परमेश्वर के करीब आना और उनकी इच्छा के अनुसार जीवन जीना अधिक महत्वपूर्ण है।

1. आत्म-त्याग और समर्पण

यह गीत हमें सिखाता है कि जब तक हम अपने अहंकार को नहीं त्यागते, तब तक हम परमेश्वर की सच्ची उपस्थिति को महसूस नहीं कर सकते। आत्म-त्याग और समर्पण ईश्वर से जुड़ने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका है।

2. परमेश्वर पर निर्भरता

हम जीवन में कई कठिनाइयों से गुजरते हैं, और यह गीत हमें याद दिलाता है कि हमें अपने संघर्षों में ईश्वर पर पूरी तरह से निर्भर रहना चाहिए।

3. आध्यात्मिक भूख और प्यास

संसार की कोई भी चीज़ हमारी आत्मा की सच्ची प्यास को बुझा नहीं सकती। केवल परमेश्वर ही हमें वह शांति और तृप्ति दे सकते हैं, जिसकी हमें आवश्यकता है।


MERE MASIHA निष्कर्ष – इस भजन की आत्मिक शक्ति

“मैं घटती जाऊँ, तू बढ़ता जा” सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने जीवन में परमेश्वर को पहले स्थान पर रखना चाहिए और अपने अहंकार को त्यागना चाहिए। जब हम स्वयं को छोटा करते हैं और परमेश्वर को बड़ा करते हैं, तभी हम उनकी वास्तविक महिमा का अनुभव कर सकते हैं।

“हे प्रभु, मुझे छोटा कर, ताकि तू मेरे जीवन में बड़ा हो सके!”

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